उस वक़्त की याद है,जब हमे ना दुनिया की समझ थी और ना ही दुनियादारी से कोई लेना देना था।कुछ था तो बस यही कि कुछ लोग अपने है और वही हमारी दुनिया है।हर वर्ग के लोग अपने बच्चों को वो सब कुछ देना चाहते है जिसकी वो चाह रखते हो,हर माता-पिता की कोशिश होती है कि वे अपने बच्चों को दुनिया की हर ख़ुशी दे और वो देते भी है।
कुछ वर्ग होते है जो हर ख़ुशी पूरी कर पाते है,कुछ वर्ग ऐसे है जो आधी खुशिया ही दे पाते है और कुछ ऐसे भी वर्ग है जो खुशिया देना तो चाहते है पर मजबूरी ऐसी की,नहीं दे पाते।
देखा गया है की ऎसे बहुत से बच्चे है जिनको 2 वक़्त की रोटी भी नसीब नहीं हो पाती और कुछ लोग ऐसे है जो हर रोज खाना फेकते है।
उन बच्चों की क्या आरज़ू नहीं की वो भी अच्छे खिलौनो से खेल कर अपना बचपन बिताएं,खिलोने तो छोड़िए जिस हाथ में एक छोटा सा खिलौना के तौर पर चम्मच होना चाहिए उन हाथो में गैचि,फावड़े नज़र आते है।
क्या उन बच्चों की आरज़ू इस मिटटी के गारे में मिल कर ही रह जायेगी।
बचपन को याद करके लोग खुश होते है,लेकिन क्या ये बच्चे भी उस बचपन को याद करना चाहेंगे,कितना दर्द भरा होगा उनके हाथो में,क्या वो दर्द उम्रदराज निकल पायेगा,निकलेगा भी तो सिर्फ अश्रुओं में।
क्या ऐसा बचपन वो याद भी करना चाहेगा,उसकी दिली-ख्वाहिश अधूरेपन से भरी हुई है जिसे वह कभी बया भी नहीं करना चाहेगा।
उस मासूमियत की उम्र में उसे दुनियदारी सिखाई गई जब उसे विद्यालय की और जाना था और जिस उम्र में विश्वविधालय जाना था उस उम्र में वो भी अपने बच्चों की आरज़ू पूरी करने में लग गए।
कुछ वर्ग होते है जो हर ख़ुशी पूरी कर पाते है,कुछ वर्ग ऐसे है जो आधी खुशिया ही दे पाते है और कुछ ऐसे भी वर्ग है जो खुशिया देना तो चाहते है पर मजबूरी ऐसी की,नहीं दे पाते।
देखा गया है की ऎसे बहुत से बच्चे है जिनको 2 वक़्त की रोटी भी नसीब नहीं हो पाती और कुछ लोग ऐसे है जो हर रोज खाना फेकते है।
उन बच्चों की क्या आरज़ू नहीं की वो भी अच्छे खिलौनो से खेल कर अपना बचपन बिताएं,खिलोने तो छोड़िए जिस हाथ में एक छोटा सा खिलौना के तौर पर चम्मच होना चाहिए उन हाथो में गैचि,फावड़े नज़र आते है।
क्या उन बच्चों की आरज़ू इस मिटटी के गारे में मिल कर ही रह जायेगी।
बचपन को याद करके लोग खुश होते है,लेकिन क्या ये बच्चे भी उस बचपन को याद करना चाहेंगे,कितना दर्द भरा होगा उनके हाथो में,क्या वो दर्द उम्रदराज निकल पायेगा,निकलेगा भी तो सिर्फ अश्रुओं में।
क्या ऐसा बचपन वो याद भी करना चाहेगा,उसकी दिली-ख्वाहिश अधूरेपन से भरी हुई है जिसे वह कभी बया भी नहीं करना चाहेगा।
उस मासूमियत की उम्र में उसे दुनियदारी सिखाई गई जब उसे विद्यालय की और जाना था और जिस उम्र में विश्वविधालय जाना था उस उम्र में वो भी अपने बच्चों की आरज़ू पूरी करने में लग गए।