Wednesday, 14 December 2016

एक नई शुरुवात के साथ एवेंजर्स के प्रेजिडेंट ने दी सुरक्षा भी

एवेंजर्स के राइडर्स के लिए इस बार कॉफी रोचक ही माहौल नजर आ रहा है।इसकी एक वजह जहाँ भोपाल का भी क्लब में शामिल होना है तो दूसरी वजह राइडर्स के लिए बढ़ाई गई सुरक्षा का होना है।
ख़ास बात देखी जाए तो एवेंजर के प्रसिडेंट की सोच है।जिन्होंने राइडर्स की सुरक्षा और उनके आनंद को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा के पुख़्ते इंतज़ामात किए है।जहाँ एक और राइडर्स के लिए मनोरंजन को प्रेजिडेंट बढ़ावा दे रहे है वही दूसरी ओर उन्होंने पूरी तरह से एवेंजर्स के राइडर्स को लेकर सावधानी बरती है।
इस बार भोपाल का क्लब में जुड़ना एवेंजर राइडर्स के लिए बड़ी ही ख़ुशी की बात हो गई है,क्योंकि अब भोपाल के राइडर्स को दूसरे क्लब में जाने की जरुरत नहीं पड़ेगी।
18 दिसम्बर को होने वाली यह मीटिंग बहुत ही रोचक साबित होगी,क्योंकि इस बार इंदौर और भोपाल के लगभग 55 राइडर्स इस मीटिंग में सम्मिलित होंगे।साथ ही ये लोग एक नई राइड लेंगे।अक्सर परिवार के सभी सभी लोग साथ होते है तो बड़ा मजा आता है और एवेंजर के राइडर्स भी एक परिवार की तरह बन चुके है।यही वजह है कि जब ये सभी लोग साथ में राइड पर जाएंगे तो आनंद दुगना हो जाएगा।एक तो एवेंजर परिवार का साथ और दूसरा प्रेजिडेंट की ओर से सुरक्षा के पुख़्ते इंतेज़ाम।साथ ही भोपाल क्लब का भी जुड़ना।इतनी सारी चीज़ो को देखते हुए यह राइड काफी सुरक्षित और आनंदमय होगी।
किसी भी दृष्टि से देखा जाए तो यह परिवार खुशहाल और सुरक्षित दिखाई दे रहा है।भोपाल क्लब में होने वाली मीटिंग में जब 55 लोग होंगे तो जाहिर से बात है प्रेजिडेंट के लिए ख़ुशी की बात तो होगी ही और जहाँ एक तरफ ख़ुशी उन्हें होगी तो उन्हें सभी की सुरक्षा का भी ध्यान रखना ही होगा।इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने क्लब के मेंबर्स के लिए कुछ नए-नए तरीके और सामना उपलब्ध कराए है।

Thursday, 8 December 2016

शिक्षा में भी ऊँच-नीच का दिखता फर्क..!!

भारत में शिक्षा पद्धति शुरू से ही जिस क्रम में रही है उसका कोई मोल-भाव ही नहीं है।गाँधी जी के ज़माने से लेकर अब तक शिक्षा पद्धति में आए फ़र्क को हम क्या महसूस करे?ये तो साफ़ देखने से ही पता चलता है कि हमारी शिक्षा पद्धति कितनी उच्च है,तभी तो गांधी जी को भी भारत छोड़ विदेश में पढाई करनी पड़ी थी।
यदि बात करे आज के ग्रामीण और शहरी शिक्षा पद्धति की,तो दोनों ही एक दूसरे के विपरीत सी दिखाई पड़ती है।कहाँ गाँव में टाटपट्टी पर बैठकर पढ़ते बच्चे तो कहाँ शहरों में टेबल पर आराम से बैठकर पढ़ते बच्चे।जब "सर्व धम्म एक" जैसी बात भारत में कही जाती है,तो सिर्फ जाति में ही नहीं बच्चो में भी फर्क क्यों??और ये कैसा फर्क है जो बच्चो में नहीं अपितु शिक्षा पद्दति में दिखता है।
जब एक बच्चा मजदूरी करके भी अपने आप को शिक्षित करना चाहता है तो फिर उसे क्यों उस तरह की शिक्षा हासिल नही हो पाती जैसी एक शहर के बच्चे को होती है।
शिक्षा के मामले में तो भेदभाव और नहीं किया जाना चाहिए,तो फिर हमारे भारत में क्यों इस तरह की शिक्षा बच्चो को मिल रही कि ग्रामीण परिवेश और शहरी परिवेश में फर्क होता है।शिक्षा तो सभी के लिए एक जैसी होनी चाहिए।गरीब का बच्चा हो चाहे अमिर का बच्चा हो।सभी को एक ही तरह की शिक्षा प्रणाली हासिल होनी चाहिए।ये बच्चो का दुर्भाग्य ही है जो उन्हें इस तरह से शिक्षा में भेदभाव सिखने मिल रहा।
यदि यही हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं जब अमीर लोग भारत से पलायन ना करके,गरीब करने लगेंगे और हो भी क्यों ना जब कोई फर्क किसी को पड़ता ही ना हो।
बच्चो का भविष्य एक जैसा होना चाहिए तो फिर प्रशासन कुछ करता क्यों नहीं।जब हर घोटाले के लिए पैसे कम नहीं पड़ते तो फिर भविष्य निर्माण में पैसा क्यों कम पड़ रहा है?
ये प्रश्न नही एक आश्चर्य का विषय है कि हम जिस देश में रह रहे है।वहाँ का प्रशासन,बच्चे और लोग एक ऐसा देश बना रहे है जहाँ निरन्तर भेदभाव को गले लगाया जा रहा है।
मसलन मुद्दा सिर्फ इतना सा नहीं है कि कोई चार दिवारी में कक्षा लेता है या कोई एक बड़े से महल में क्लास चलाता है,बल्कि मुद्दा तो यह है कि यदि चार दीवारी और महल में पढ़ने वाले बच्चो की शिक्षा प्रणाली एक जैसी कर दी जाए।ताकि भविष्य में उन्हें कोई समस्या या असमंजस में ना पड़ना पड़े।

Tuesday, 15 November 2016

कालाधन लाना है या भारत को सताना है

मोदी जी ने अचानक कालाधन लाने के लिए 500 और 1000 के नोट तो बंद करा दिए है,लेकिन इसका असर सबसे ज्यादा आम नागरिक पर देखने को मिल रहा है।मोदी जी चाहते तो थे कि सब बराबरी से लाइन में लगे,लेकिन अफ़सोस ऐसा हो नहीं पाया।
जिस उम्र में उनकी माँ को सहारे की जरुरत है उस समय वो बैंक में लाइन में लगकर नोट बदलवा रही है और जिन्हें बदलवाने चाहिए वे तो हाथ बांधकर बढ़िया से आराम फरमा रहे है।खैर ये बात तो सिर्फ मोदी जी प्रधानमंत्री है इस लिहाज से हम देख रहे है,लेकिन उन बुजुर्गों का क्या जिनके पास आसरे के लिए कोई भी नही है और जो कतार में लग कर पैसा पा रहे है??उनकी फ़िक्र कौन करेगा?मोदी जी आपका फैसला कालाधन लाने का था या देश की जनता को सताने का था।
जो भी हो पर आपने जिस भी नजरिए से यह फैसला लिया था वो अब दरअसल उल्टा ही नजर आ रहा है,क्योंकि आपकी सोच थी कि कालाधन उजागर हो।लेकिन देश के भ्रष्ट लोगो ने तो पहले ही उसका उपाय किया हुआ है।मतलब बात ये है कि कालाधन रखे हुए व्यक्ति अपना सारा पैसा विदेशो में रखे हुए है,जिसे आप नहीं देख सकते और आज तक ऐसा कोई मापने का पैमाना नही बना है जो कालाधन माप सके।
तो जिनके लिए ये नोट बदलने का हथकंडा आपने अपनाया था,वो तो चले गए सुरक्षित क्षेत्र में और आम जनता तो गई कतार में।
खैर देखते है कितना और समय अब लगता है कालाधन वापस लाने में,क्योंकि हर सरकार का एक मुद्दा ये जरूर है कि वो कालाधन लाएगी वापस,पर अफ़सोस वो बस एक मुद्दा ही रह जाता।कही इस बार भी कालाधन वापस लाना एक मुद्दा बनकर ना रह जाएं।
राजनैतिक हथकंडे ही लगते है अब ये कुछ मुद्दे तो।जिनमे से एक कालाधन वापस लाने वाला है।बाकी गरीबी मिटाना,भ्रष्टाचार मिटाना, भूखमरी, महँगाई जैसे मुद्दे तो रहते ही है,पर कालाधन अब तक रामदेव बाबा ला रहे थे और अब सरकार जुट गई है तो लगता है इस बार तो आ ही जाएगा।खैर सब लुभावना लगता है पर कभी होते हुए दिखा नही तो एक सपना सा भी लगता है।

Saturday, 5 November 2016

मोदी जी की बहार,किया पत्रकारों को बाहर।

वाह रे मोदी सरकार आप हो खुशियो की बहार,लेकिन किन लोगो के लिए।बड़ा सवाल तो ये है कि आखिर आप किन लोगो के लिए बहार लाने का काम कर रहे??इस सवाल का यदि जवाब दिया जाए तो चाटुकारों का।हँसी आती है इस बात पर की पत्रकारिता यदि चाटुकारिता के भरोसे चलने लगी तो लगता है कि शीघ्र ही पत्रकारों को सन्यास ले लेना चाहिए।क्योंकि यदि पत्रकारिता चाटुकारिता पर निर्भर करती है तो पत्रकार का अस्तित्व ही खत्म हो जाता है।

युवा पत्रकारों को आपके NDTV को बैन करने से एक नई मोदी सोच का पता तो चला कि आप ये नई पीढ़ी को अंतर्मन से कह रहे होंगे कि अरे मूर्खो तुम भी रविश कुमार की भाँति सच और अच्छी फुटेज ना दिखाना वरना तुम युवा पत्रकारों पर ही बैन लगा दूँगा।

सांप भी मर जाएं, लाठी भी ना टूटे।
क्या करना है पत्रकारों का वैसे भी किसी भी घोटालों को सामने लाकर रख देते है।भई आखिर हम मंत्री है हमारा भी कोई अधिकार है।अधिकार यह है कि हम बड़े-बड़े घोटाले कर सके,लेकिन यदि घोटाले करते है तो ये पत्रकार और मीडिया चैन से रहने कहा देता है।बेहतर यही होगा कि सच को जो सामने लाने की कोशिश करे उसे ही खत्म कर दे,ताकि साँप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे।

यदि ये हतियार सही है तो देश में पत्रकारों और मीडिया का रोल ही खत्म हो जाता है।इस हिसाब से देखे तो पत्रकारिता ही ख़त्म हो जाएंगी।लेकिन ऐसा होगा भी तो नहीं ना,क्योंकि देश का भविष्य तो चाटुकारिता और चाटुकार है।तब तो साधारण सी बात है कि पत्रकारिता को चाटुकार ही जिन्दा रखेंगे।

हाँ खैर सही भी है पत्रकार यदि चाटुकार  रहे तो नेताओं के वाह रे न्यारे और जनता सारी लगाओ रे नारे।मापदंड का पैमाना काफी सटीकता से प्रयुक्त किया है सरकार ने।विपक्ष को बदनाम करना हर राजनैतिक दल का अधिकार है मानो,पर पत्रकारों या मीडिया को बदनाम करना ये कौन सा नया अधिकार कानून में शामिल हो गया।

बात तो ये है कि आप बहुत सहजता से ये काम कर सकते है,लेकिन आपके तराजू में पत्रकारों को तौलना का मापदंड समझ से बाहर है।ऐसे तो लगभग हर चैनल पर आपने बैन करना चाहिए था पर किया नहीं।हाँ शायद उन चैनलों की सीमा NDTV की सीमा से ज्यादा रही होगी या फिर वे चैनल्स आपके पसंदीदा रहे होंगे।खैर पसंद नापसंद तो क्या ही कहे मुश्किल है,पर लगता है यहाँ भी वही चाटुकारिता का जलजला है जो शायद NDTV कर नहीं पाया।उसका ही खामियाजा भुगत रहा है।

Monday, 8 August 2016

शतक हफ्ते और जीएसटी का आगमन।

यूँ तो मोदी सरकार को सौ हफ्ते ही हुए है,लेकिन इन्ही सौ हफ़्तों में इतने काम कर डाले है कि वह सौ वर्षो जितने लगते है।फिलहाल यदि बात की जाए सरकार के कार्यो की तो सबसे मुश्किल कार्य भी सरकार ने संपन्न कर ही लिया।ऐसे तो देश में जीएसटी लागू करने का स्वप्न पिछली सरकार के समय से देखा जा रहा था,किन्तु उसे वास्तविकता में समक्ष अबकी सरकार के सानिध्य में होता हुआ देखा है।जीएसटी कर के लागू होने से देश में सभी का विकास होगा ये तो तय है ही साथ ही रोजगार के अवसर बढ़ेंगे,अब ये भी तय हो ही गया।जीएसटी लागू होने से हमे कई फायदे होंगे साथ ही छोटे व्यापरियों को भी मुनाफा होगा।जीएसटी लागू होने के बाद से ना सिर्फ कर में कमी आएगी अपितु महँगाई दर भी कम होगी।लोकसभा में अपनी बात रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने सभी राज्यो और अन्य दलों का भी आभार प्रकट किया।उन्होंने कहा कि जीएसटी बिल को लाने में सभी दलों की भूमिका रही है,ये निष्पक्ष भाव से राष्ट्रहित की भावना है।इसमें कोई मतभेद ना रखते हुए सभी दलों ने अपना समर्थन दिया है।जीएसटी बिल के लिए 29 राज्यों तथा 90 राजनीतिक दलों ने हामी भरी है।जीएसटी लागू होने से कई फायदे होंगे।जैसे:-छोटे व्यापारियों को आसानी से लोन प्राप्त होगा, जमीन के रेट कम होंगे।अब आपको प्रत्येक सामान पर कर अदा नहीं करना होगा,अपितु पुरे सामान के लिए केवल 18% कर भुगतान करना होगा।पहले आपको 14-15%कर प्रत्येक सामान पर भुगतान करना पड़ता था।इससे आपको बहुत हद तक बचत होगी।जीएसटी लागू होने के बाद प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और प्रतिस्पर्धा बढ़ने से रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।इससे युवाओं को लाभ मिलेगा।जीएसटी लागू होने के वजह से दूसरे राज्यों से सामान के आदान-प्रदान में सहयोग मिलेगा।जीएसटी की वजह से गरीबों की उपयोगी चीजे टैक्स दायरे से बाहर होगी।जरुरी दवाएं जीएसटी से बाहर होगी।जीएसटी की वजह से राज्य और केंद्र में सहयोग बढ़ेगा जिससे विदेशों से सामान कम मँगवाना पड़ेगा।जीएसटी की वजह से भ्रष्टाचार में कमीं आएगी क्योंकि वयवस्थाओं में सुधार आएगा और वयवस्था में सुधार आने से गलत आदमी भी सुधरेगा जिससे भ्रष्टाचार में कमी आएगी।पहले व्यापारी कच्चा बिल बनाकर ग्राहक को टाल देते थे,लेकिन अब पक्का बिल ही मिलेगा।इससे ग्राहक को परेशानी नहीं उठानी पड़ेगी।टैक्स पेयर्स और कलेक्टर के बीच ह्यूमन इंटरेक्शन बंद हो जायेगा जिससे हमें फायदा होगा।इससे कालेधन को रोकने में मदद मिलेगी।सरकार ने आरबीआई से महँगाई 4 फीसदी करने को कहा,इससे गरीबों को नुकसान नहीं होगा।किसके पास कितना धन है इसकी जानकारी केंद्र और राज्य दोनों के पास रहेगी जिससे दोनों के मध्य संपत्ति तनाव नही होगा।इतनी सारी खूबियों के साथ जीएसटी बिल आया है।खैर इसे पहले लोकसभा में पारित कर दिया गया था किंतु कुछ संशोधन की वजह से दुबारा लोकसभा में पेश किया गया।सरकार ने विपक्ष की बात मानकर राज्यों के विनिर्माण में 1% अतिरिक्त कर लगाने  हेतु मना कर दिया।विधेयक में 1% अंतर-राज्जीय कर को समाप्त कर विपक्ष की तीन में से एक बात को मान लिया।जीएसटी लागू होने से अब आपको केंद्र और राज्य दोनों को कर भुगतान नहीं करना होगा,केवल एक बार ही भुगतान करना होगा।इतनी सारी सुविधाएं पेश करने के साथ ही मोदी सरकार का कार्य सफल होता दिखाई दिया।100 हफ़्तों में मोदी सरकार ने 100 से ज्यादा कानून पारित किए है।

Sunday, 7 August 2016

काश मै भी एक लड़का होती।

जब भी एक कदम घर से बाहर निकालती हूँ,मुझे ऐसा महसूस होने लगता है जैसे क्या गलती कर दी हमने कि हम लड़की है।चार कदम ज्यों ही आगे बढाती एक नया कमेंट सुनने मिलता।काश ऐसा होता की हम भी लड़को जैसे सड़क से चलते हुए लड़को को कमेंट कर ही देते,तब शायद उन्हें एहसास होता है कि उनके कमैंट्स से हम लड़किया थोड़ा ही पर चिढ ही जाती है।क्यों ना ऐसा किया जाएं कि अब से इन लड़को के सामने उनकी बहन को खड़ा किया जाएं और किसी और लड़के से कमेंट पास करवाया जाएं।फिर देखते है जो सड़क छाप लड़के दूसरों की बहनों को कमेंट करते फिरते है,उनसे अपनी बहन के लिए सुना जाता है या नहीं।अगर सुन सकते हो तो बेशक ही दुसरों की बहनों को कमेंट करो पर यदि खुद की बहन के लिए नही सुन सकते तो दूसरों की बहनो को बोलने से पहले एक बार ही सही सोच कर तो देखो।क्या पता सोच बदल ही जाए और फिर भी फर्क नही पड़ता हो तो फिर तो यही होता कि काश मै भी एक लड़का होता।साथ ही ये भी कि हर लड़की यही सोच लेती है और ऐसा हो जाता है तो सोचो लड़कों तुम्हारे तो अरमान ही टूट जाएंगे।इसलिए लड़कियों की इज्जत करना सीखों और यदि नही हो पाता है तो अपनी बहन के लिए भी दुनिया के हर लड़को से कमेंट सुनते रहो और ख़ुशी से सुनो।

Tuesday, 19 January 2016

मौत के घाट उतरती ज़िन्दगी।

हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र की मौत के बाद से देश के माहौल में कुछ अलग बदलाव नज़र आ रहे है।एचसीयू के छात्र रोहित वेमुला का आत्महत्या करना शासन के नजरिये से वाजिब ही दिखाई दे रहा है।छात्र रोहित वेमुला ने अपने आखिरी ख़त में ये बात ज़ाहिर की थी कि उसकी मौत का जिम्मेदार उसकी ही यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर अप्पा राव है तथा साथ ही केंद्रीय मंत्री दत्तात्रेय भी है।हैदराबाद के गाचीबावली थाने के इंस्पेक्टर जे.रमेश कुमार के अनुसार छात्रो ने यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर और केंद्रीय मंत्री के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवाई है।इसके अलावा छात्रो ने  विधानपार्षद रामचंद्र राव और दो अन्य छात्रो को भी दोषी बताया है।वे छात्र है सुशील कुमार और रामकृष्ण,इन दोनों पर भी रोहित को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप है।रोहित के शव को पोस्टमार्टम के लिए लेने जब पुलिस पहुची तो छात्रो ने पुलिस लौट जाओ के नारे लगाकर रोकने की कोशिश की हलाकि कड़ी मशक्कत के बाद पुलिस शव को पोस्टमार्टम के लिए ले गई।छात्र ने अपनी अंतिम चिट्ठी में लिखा था कि उसे यूजीसी द्वारा मिलने वाली जूनियर रिसर्च फेलोशिप पिछले छः माह से नहीं मिली थी जिसके चलते उसे कठिनाईयो का सामना करना पड़ रहा था तथा साथ ही उसे और उसके मित्रो को हॉस्टल से निकालने की बात की जा रही थी।छात्र रोहित का शव न्यू रिसर्च स्कॉलर्स हॉस्टल के कमरे में फंदे से लटका हुआ मिला।छात्रो ने इस घटना के बाद कड़ा विरोध प्रदर्शन किया।यूँ तो देखा जाये तो दलित छात्रो के सविधान के तहत काफी हद तक आरक्षण किया गया है,बावजूद इसके छात्रो को आत्महत्या जैसा बड़ा कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ रहा है।देश में सबसे ज्यादा आरक्षण आंध्र प्रदेश में ही है फिर भी छात्रो को इतना बड़ा कदम उठाना पड़ रहा है आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है और कहा तक है?? ये बड़ा सवाल हमारे देश की आरक्षण व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।एक रिपोर्ट के मुताबिक आंध्र प्रदेश में S.C.,S.T. और O.B.C. के लिए आरक्षण का प्रतिशत क्रमानुसार 15%,16% तथा 25% निर्धारित है।फिर भी ऐसी घटना का सामने आना देश की और शाशन व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।कुल मिलाकार आंध्र प्रदेश में आरक्षण 66.66% है इसके बाद भी छात्रो के साथ अन्याय देश को शर्मशार करने वाली घटना है।