Saturday, 31 October 2015

घूसखोरी कब तक और कितनी???

घूसखोरी केहने को तो आज के समय में बहुत आम बात हो गई है।वैसे देखा जाये तो सही भी है,क्योंकि आजकल तो हर क्षेत्र में बिना घूसखोरी के कोई काम भी तो नहीं होता।घूसखोरी में भारत भी किसी दिन महारत हासिल कर ही लेगा।ना जाने क्यों और कब तक ये सिलसिला जारी रहेगा,जब एक बेरोजगार नौकरी के लिए जाये तो पहले पैसा दे फिर नौकरी पाये,जब एक वृद्ध अपनी पेंशन के लिए दफ्तर में पैसे ना दे पेंशन नहीं मिल पाएगी।ऐसा कई दफे देखा गया है एक वृद्ध अपनी पेंशन के लिए कई बार दफ्तरों में चक्कर लगाते लगाते थक जाते है पर जब तक पैसा ना रख दे काम नहीं होता।आंकड़ो के मुताबिक देखा जाये तो 2013 में भारत 94वीं रैंक थी,175 देशो में से,इसी घूसखोरी में लेकिन वही 2015 में भारत का 175 देशो में से स्थान घूसखोरी में ऊपर आकर 85वाँ हो गया।इस आंकड़े के मुताबिक तो शायद भारत जल्द ही और ऊपर आने की ताक में ही होगा।सभी दफ्तरों में देखा गया कि बेरोजगार घूमने वाले इंसानो में 2005 में 62%व्यक्तियो को रोजगार घुस लेकर प्राप्त हुए है।ये सब आंकड़े तो भारत का स्थान ऊपर ला ही देंगे लेकिन इसके अतिरिक्त राजनीति क्षेत्र की बात की जाए तो 2009 में 524 सदस्य वाली संसद में से 120 सदस्य अपराधी घोषित किये गए थे।वही 2G स्पेक्ट्रम घोटाले में कैबिनेट मंत्री,मुख्यमंत्री इन सबने मिलकर 1.7 लाख करोड़ का घोटाला किया।फिर एक आंकड़ा कामनवेल्थ गेम्स का लिया जाये तो 2010 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में 70,000  करोड़ का घोटाला पाया गया।अब देश के बड़े घोटालो में से एक और घोटाले की बात की जाये तो कोयला घोटाला उसमे भी 1.86 लाख करोड़ का घोटाला पाया गया।ये तो सब छोटे मोटे आंकड़े ही हम कह सकते है।अभी इसके अतिरिक्त और भी ऐसे क्षेत्र है जिनके घोटाले भी शामिल किये जाये तो मेरा भारत महान कहना गलत ना होगा।

Sunday, 25 October 2015

अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो।

ना जाने ऐसा क्या गुनाह किया था मैंने पिछले जनम में कि इस जनम में भगवान आपने मुझे बेटी बनाया।क्या बेटी होने का मतलब हर दफे सबकी सुनना,सबका ध्यान रखना और सबकी मर्जी के अनुसार चलना ही होता है???अगर ऐसा है तो मेरे जीवन का अस्तित्व ही क्या है??क्यों है??क्या मेरी अपनी कोई सोच नहीं,कोई आजादी नहीं।ये तो तब तक की बात है जब तक मेरा नया जीवन शुरू नहीं हुआ है।जिस दिन मेरे नए जीवन की शुरुआत हो गई,मै अपने ससुराल चली गई उस दिन से क्या मेरा जीवन परिवर्तित होगा या मुझे ही परिवर्तित होना पड़ेगा।
            क्या हर दफे सबकी इच्छाओ के अनुरूप मुझे ही बदलना पड़ेगा??क्या कभी मेरे लिए कोई अपनी सोच,अपनी इच्छा को नहीं बदल सकता।यदि ससुराल अच्छा मिला तब तो ठीक है और अगर कोई लड़ाकू,लालची परिवार से पाला पड़ा तब तो मेरा जीवन ही बेकार है।पहले तो दहेज़ के लोभी हर दफे मुझे परेशान करेंगे और मेरे घर वालो को भी परेशान करेंगे।यहाँ तक तो शायद बात अलग ही थी लेकिन फिर हर बात में मुझे परेशान करना मारना पीटना ये कैसा दहेज़ का लालच है।कभी मेरी कोई बात ना मानकर,हर बात के लिए मुझे जाहिलो की तरह मारना ही मकसद है।क्या मेरा जनम सिर्फ घरेलु हिंसा सहने के लिए ही हुआ है।हर वक़्त घर के कामो में उलझे रहने के बाद क्या कभी मेरा मन नहीं होता होगा कि कही घुमु कुछ पल हँस लू  मै भी।लेकिन जब भी ऐसा करने की कोशिश करती हूँ उससे पहले वो मार का दर्द मुझे पिछले दिन की याद दिला देता है।जैसे मै कोई खिलौना हूँ जिसे जब चाहा खेल लिया और जब चाहा उठा के फेक दिया।क्या मेरा लड़की होना गुनाह है,यदि ऐसा है तो हे!भगवान अगले जनम मुझे बेटी ना बनाना।लेकिन ये दर्द कब तक मुझे सेहते ही रहना है,क्या हर जनम में ये दर्द मुझे ही मिलेगा,क्योंकि मै एक लड़की हूँ इसकी सजा मुझे कब तक भुगतनी होगी।क्या मै एक इंसान नहीं???लेकिन अब तक जो हुआ सो हुआ,किन्तु अबसे मै ना तो अपने साथ बुरा होने दूंगी ना ही दुसरो के साथ।भगवान ने यदि मुझे बेटी बनाया है तो कुछ तो मुझमे भी बेटो से जादा समझदारी दी ही होगी।शुक्रगुजार हूँ मै आपकी प्रभु की आपने इस जनम में मुझे बेटी बनाया ताकि मै सारे जुर्म ना सेहते हुए उस जुर्म के विर्रुद्ध संघर्ष करू और मै यही चाहती हूँ कि अब मुझे अगले जनम और हर जनम मे सिर्फ बेटी ही करना,ताकि मै सारे अत्याचारो के खिलाफ आवाज़ उठा सकूँ,लड़ सकूँ।

Friday, 23 October 2015

घर अपना या पराया???

एक दिन था जब आप मुझे पहली बार अपनी गोद में लिए थे,उस दिन आपकी आँखों में नमी थी ना जाने क्या कारण था उस नमी का,लेकिन मुझे गोद में लेते ही आपके आँखों में नमी थी  कही मैंने कोई गुनाह तो नहीं किया ना इस दुनिया में आकर।फिर हर दिन मुझे बड़ा होता देखकर आप खुश तो होते थे लेकिन अंदर ही अंदर उतने ही दुखी भी होते।हर दिन अपने मन को समझाते बहलाते  देखा आपको,ना जाने वो कोनसा डर था जो आपको मन ही मन खाये जा रहा था,जिसे माँ भी ना समझ पाती लेकिन माँ को भी अक्सर किसी दुविधा में डूबे रहते देखा था।समझ तो ना पाती पर समझने की कोशिश जरूर करती थी।
                     और जिस दिन वो दिन आया आप दोनों का डर मेरे मन में भी घर कर गया।कितना अजीब दस्तूर है इस दुनिया का जिन हाथो ने ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया,हर कदम सम्भलकर चलना सिखाया,आज वही हाथ कन्यादान के लिए आगे बड़े।कहते तो है सबसे बड़ा दान कन्यादान होता है लेकिन क्या किसी भी माता-पिता के लिए ये इतना आसान होता है कि जिसे छोटे से बड़ा किया,जिसे हर पल सहज के रखा,आज उसी को किसी पराये हाथो में सौप दे।कितना दर्द होता है उस पिता के मन में अपनी बेटी के लिए।क्या पता जिन हाथो में अपने फूल को सौपा है वो हाथ उसे काटे तो नहीं चुभा देंगे।
                              दिल पे पत्थर रखकर ये दायित्व पूरा तो माता-पिता ने कर दिया,पर मै तो अभी भी दुविधा में हूँ।भगवान ये कैसी रीत बनायीं है आपने,जिस घर में रहकर बचपन निकाला,जहाँ बड़ी हुई वो घर तो अपना है ही नहीं।जिस घर को कभी नहीं देखा था वो अब मेरा बसेरा होगा।अब वही मेरा संसार है और वही से मेरी अर्थी भी उठेगी।ये भी क्या अजीब सिलसिला है मेरे जीवन का,जहाँ पैदा हुई बड़ी हुई वो घर पराया निकला और जिस घर से अनजान थी अब वो मेरा परिवार और मेरा दायित्व है।
            मेरा जन्म और म्रत्यु बिल्कुल ही चाँद-सूरज की तरह है।जैसे चाँद के आने पे सूरज जाता है और सूरज के जाने पर चाँद आता है वैसे ही मेरा जन्म स्थल मायका बन जाता और मेरी मर्त्यु स्थल ससुराल हो जायेगा।ना जाने कैसे माँ-पापा आपने मुझे विदा किया होगा।एक दिन शायद मै भी इस दायित्व को पूरा करती हुई नजर आउंगी,तब ना जाने कैसे अपने मन को इतना बड़ा कदम उठाने के लिए मना पाऊँगी।शायद मुझसे ये नहीं हो पायेगा।मेरा सोच कर मन कापता है और ना जाने आपने कैसे ये साहस दिखाया होगा।
                           मैंने तो सिर्फ दो परिवारो को मिलाया और साथ ही दो घर भी मेरे है,लेकिन आपने तो अपने घर से जब मुझे भेजा होगा तब एक अँधेरा सा घर में लगा होगा और जब मुझे अपने घर भेजा उसके बाद आपके घर के किसी कोने में बैठकर रोये होंगे उस आंसू को कैसे भूल सकती हूँ।मुझे विदा तो कर दिया था लेकिन आपके और मेरे रिश्ते की डोर ही ऐसी है कि मुझे दिल की नज़र से सब दिख रहा है,आपके वो आंसू।ये परम्परा भी बड़ी दुविधा में डालती है कि एक बेटी को अपने पिता और परिवार से जुदा करती है तो दूसरे परिवार से जोड़ देती है।मै भी टूटी उस पल लेकिन इस वक़्त मेरे पास मेरा नया परिवार था लेकिन आपने कैसे खुद को संभाला होगा?कैसे माँ और आप रहे होंगे??पर मुझे ख़ुशी है कि आप मेरे नए जीवन को देखकर खुश भी उतना ही होंगे।ये आपके जीवन की अमूल्य सम्पदा होगी।

Saturday, 17 October 2015

परिस्थिति

एक वक़्त था जब हर कोई मेरा अपना था,हर कोई मुझे पूछता था।समाज में मेरा भी एक बाहुबल था,हर कोई मुझे पूछता था।याद करता था,फिर ना जाने क्यों अचानक ही सबने मुझसे मुँह फेर लिया,ऐसा क्यों हुआ।कही इस सब की वजह मेरी परिस्थिति तो नहीं थी।हाँ कभी मेरा एक रुतबा था,एक अलग ही पहचान थी।कही वो सिर्फ मेरे पैसो या दौलत की वजह से तो नहीं थी।
     मुझमे ऐसा तो कोई परिवर्तन नहीं आया जिसके वजह से सब मुझसे मुँह फेर रहे??लेकिन इसका कारण आखिर है क्या?मेरा रवैया सभी के लिए पहले की तरह ही फिर भी ऐसा क्यों??? अब धीरे-धीरे समझ रहा हूँ कि ऐसा मेरे साथ क्यों हो रहा है।अगर उस रात दुर्घटना में मेरा पैर अलग ना हुआ होता और मै पहले के तरह ही पैसा कमाता तो शायद लोग वैसे ही व्यवहार करते जैसा पहले था।
                                 लेकिन क्या किसी भी व्यक्ति की अहमियत उसके पैसो से होती है,अगर ऐसा होता है तो झूठे और मक्कार अमिर लोग बड़े सज्जन होते है और शरीफ एवम् ईंमानदार गरीब बहुत ख़राब होते होंगे।शायद आज के समय में यही दस्तूर होगा।वैसे कमाल के है इस दुनिया के कायदे जो लाचार उसका लोग मजाक बनाते है और जो लोग उच्च श्रेणी में आते है उनको लोग पूछते है।दस्तूर भी बड़ा अजीब है इस ज़िन्दगी का जहाँ एक पल कोई सम्भालता है तो उसी पल कोई बिखरता है।
                        खैर इसी का नाम जीवन है,लेकिन इस संघर्ष के वक़्त कौन साथ निभाता है ये देखने वाली बात होती है।हर वक़्त को अच्छा ही समझना चाहिए,क्योंकि जो अच्छा वक़्त होता है उसके साथी सभी होते है।लेकिन जो बुरा वक़्त होता है उसमे आपका साथी कौन है और कौन नहीं,ये अवश्य ही ज्ञात हो जाता है,इसलिए कभी कोई वक़्त बुरा नहीं होता।
                     बस कुछ वक़्त ख़ुशी देते है तो कुछ ज्ञान।परिस्थिति चाहे जैसी भी हो,लेकिन जो उसे खुश रहते हुए पार कर जाये।उसके जीवन में कभी बुरा वक़्त नहीं आ सकता और ना ही वह कभी दुखी हो सकता है।इसलिए हमेशा हर वक़्त खुश रहो।

Sunday, 11 October 2015

पलायन

शहरीकरण,औद्योगिकीकरण दो ऐसे शब्द है जिसने लोगो का शहरो की ओर रुझान बढ़ाया।बढ़ने के कारण लोग आज कल गाँवो को छोड़ कर शहरो की ओर जा रहे।गाँव लोग और आज की पीढ़ी तो जैसे इसे जानते ही ना हो,लोग दूर भागते है।गाँव में भी अब शायद ही किसी पेड़ की नीचे पंचायत वाला माहौल ही बचा हो।क्या नज़ारे थे जब लोग पेड़ के नीचे बैठ कर कोई समस्या का निदान किया करते थे।आस-पास कुछ जानवर भी हुआ करते है।
                             मगर आज के दिन कुछ ऐसे है कि लोग अदालतों में मुकदमा चलाते है।अपने पराये होते जा रहे है और पराये अपने।दिखावट की इस कशमकश में लोग अपने पराये में अंतर भूल रहे है।खैर परयो को अपना बनाना कोई गलत बात तो नहीं किन्तु अपनों को पराया करना बहुत मुश्किल सा लगता है।धूमिल सभा ही बड़ी याद आती है।बच्चा जब खाकी रंग के वस्त्रो में विद्यालय जाया करते थे,अब वो नज़ारे कही गुल से लगते है।आजकल तो बच्चे भी बड़े अफसरों जैसे वस्त्रो में दीखते है जो की विद्यालयीन छात्र है।
                        शहरीकरण का खुमार ऐसा छा गया है कि लोग 1 दिन अपने घर में अतिथि भी स्वीकार नहीं कर पाते।
                                 अतिथि देवो भवः तो केवल अब किताबी पन्नों में नज़र आता है,जो कि कुछ शब्द ही रह गए है।लोगो का विश्वास यह रह गया है कि जो बलवान है या पैसो से भरा हुआ है वही रिश्तेदार है,उसके तलवे धोकर पानी पीना ही सार है और जो गरीब है या जिसके पास बाहुबल नहीं उससे कोई रिश्ता नहीं,वे हमारे तलवे धोकर पानी पिए।ये कैसा अजीब सा नवीनीकरण हुआ है इस संसार का की अपने अपनों को भूल रहे और पराये अपने होते जा रहे।
      बिल्डिंगो में रहना लोग शान मानते है और झोपड़ों में रहने वालो को आम मानते है।लेकिन कई दफे बिल्डिंगो की शान कुछ नहीं कर पाती और झोपडो के आम कुछ कर दिखा देते है।और ऐसा कई दफे नहीं अक्सर देखा जाता है।शान हो या अपमान दोनों का अपना महत्त्व है,कुछ लोग शान रहने के बाद अपमानित होते है तो कुछ अपमानित होकर,शान को प्राप्त करते है अर्थात जो अपमान झेलता है उसे चीड़ होती है एक बदले की जो वो कुछ हासिल कर शान प्राप्त करता है।बड़ा अजीब सिलसिला है जो थमने का नाम ही नहीं लेता,पलायन होता जा रहा और लोग खुद को मजबूर करते जा रहे।लेकिन उन किसानो का जिनके दम पर लोग जी रहे है,कभी यदि उन्होंने भी शहरों की ओर पलायन किया तो बाकि लोगो का क्या होगा क्या फिर लोग अपने घरो में छोटी-छोटी क्यारियों में सब्जी-भाजी लगाकर खुद ही किसान बन जायेंगे।

Wednesday, 7 October 2015

मायाजाल

गुमनाम सी इस दुनिया में कुछ गैर,कुछ अपने है तो कुछ अनजान है।बड़ी ही दुविधा का विषय है किस पर यकीन किया जाये किस पर नहीं।यकीन कोई किसी पर करे या ना करे पर कभी कभी मजबूरी भी एक ऐसा दाव पेश करती है कि मजबूरन किसी भी इंसान पर भरोसा करना पड़ता है।कई दफे उन लोगो का हाथ थामना पड़ता है जो गैर है जो नापाक मंसूबो वाले है।आकड़ो के मुताबिक़ ये देखा गया है कि बहुत सी ऐसी लडकिया है जो नाबालिग होती है,और जो किसी परिस्तिथि के कारण घर से दूर काम की तलाश में निकलती है,पर वो जिस काम का बोल कर ले जाई जाती है वह काम उसे मिलता नहीं है अपितु एक नए षड़यंत्र का शिकार बन जाती है।ऐसे मायाजाल में फसाया जाता है कि वह चाह कर भी वहा से निकल नहीं पाती है।ये मायाजाल है लड़कियो को फसा कर धंधे में लगाने का।मजबूरी के नाम पर उनको उस दलदल में धकेल दिया जाता है जहा से उनका निकलना असंभव है।
                              धोखाधड़ी और मोह के इस जाल में फसती लड़कियो को बचाना क्या इतना आसान है??कुछ ऐसी लड़कियो की भी दास्ताँ सामने आती है जो नाबालिग थी लेकिन जब परिवार वाले ढूंढते है तो कई दफे वे लडकिया बालिग हो जाती है पर उनका पता नहीं लग पाता है।परिस्तिथि,मजबूरी से शिकार लडकिया उस जगह आकर खड़ी हो जाती है,जहा से सिर्फ चारो और अँधेरा ही दिखाई देता है।ऐसे में प्रश्न ये उठता है कि इस अँधेरे को हटा कर रौशनी का दिया कैसे जलाया जाये?इस अँधेरे को दूर करने के उपाय किये जाये।आखिर कब तक ये मायाजाल कई लड़कियो और परिवार की खुशियो को छिनेगा और उन लड़कियो को दलदल में डालेगा।कानून बनने के बाद भी इन सभी समस्याओ में कमी नहीं हो पाती।इसका कारण क्या और क्यों है?इस विषय में गंभीरता से सोचा जाना चाहिए,कि क्यों कानून बनने के बाद भी ये सब होता है।
                         इसे परिस्थिति की मार कहे या विवशता की ऐसा जाल हमारे सामने आता है,फिर भी हम लोग कुछ नहीं कर पाते है।