एवेंजर्स के राइडर्स के लिए इस बार कॉफी रोचक ही माहौल नजर आ रहा है।इसकी एक वजह जहाँ भोपाल का भी क्लब में शामिल होना है तो दूसरी वजह राइडर्स के लिए बढ़ाई गई सुरक्षा का होना है।
ख़ास बात देखी जाए तो एवेंजर के प्रसिडेंट की सोच है।जिन्होंने राइडर्स की सुरक्षा और उनके आनंद को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा के पुख़्ते इंतज़ामात किए है।जहाँ एक और राइडर्स के लिए मनोरंजन को प्रेजिडेंट बढ़ावा दे रहे है वही दूसरी ओर उन्होंने पूरी तरह से एवेंजर्स के राइडर्स को लेकर सावधानी बरती है।
इस बार भोपाल का क्लब में जुड़ना एवेंजर राइडर्स के लिए बड़ी ही ख़ुशी की बात हो गई है,क्योंकि अब भोपाल के राइडर्स को दूसरे क्लब में जाने की जरुरत नहीं पड़ेगी।
18 दिसम्बर को होने वाली यह मीटिंग बहुत ही रोचक साबित होगी,क्योंकि इस बार इंदौर और भोपाल के लगभग 55 राइडर्स इस मीटिंग में सम्मिलित होंगे।साथ ही ये लोग एक नई राइड लेंगे।अक्सर परिवार के सभी सभी लोग साथ होते है तो बड़ा मजा आता है और एवेंजर के राइडर्स भी एक परिवार की तरह बन चुके है।यही वजह है कि जब ये सभी लोग साथ में राइड पर जाएंगे तो आनंद दुगना हो जाएगा।एक तो एवेंजर परिवार का साथ और दूसरा प्रेजिडेंट की ओर से सुरक्षा के पुख़्ते इंतेज़ाम।साथ ही भोपाल क्लब का भी जुड़ना।इतनी सारी चीज़ो को देखते हुए यह राइड काफी सुरक्षित और आनंदमय होगी।
किसी भी दृष्टि से देखा जाए तो यह परिवार खुशहाल और सुरक्षित दिखाई दे रहा है।भोपाल क्लब में होने वाली मीटिंग में जब 55 लोग होंगे तो जाहिर से बात है प्रेजिडेंट के लिए ख़ुशी की बात तो होगी ही और जहाँ एक तरफ ख़ुशी उन्हें होगी तो उन्हें सभी की सुरक्षा का भी ध्यान रखना ही होगा।इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने क्लब के मेंबर्स के लिए कुछ नए-नए तरीके और सामना उपलब्ध कराए है।
Wednesday, 14 December 2016
एक नई शुरुवात के साथ एवेंजर्स के प्रेजिडेंट ने दी सुरक्षा भी
Thursday, 8 December 2016
शिक्षा में भी ऊँच-नीच का दिखता फर्क..!!
भारत में शिक्षा पद्धति शुरू से ही जिस क्रम में रही है उसका कोई मोल-भाव ही नहीं है।गाँधी जी के ज़माने से लेकर अब तक शिक्षा पद्धति में आए फ़र्क को हम क्या महसूस करे?ये तो साफ़ देखने से ही पता चलता है कि हमारी शिक्षा पद्धति कितनी उच्च है,तभी तो गांधी जी को भी भारत छोड़ विदेश में पढाई करनी पड़ी थी।
यदि बात करे आज के ग्रामीण और शहरी शिक्षा पद्धति की,तो दोनों ही एक दूसरे के विपरीत सी दिखाई पड़ती है।कहाँ गाँव में टाटपट्टी पर बैठकर पढ़ते बच्चे तो कहाँ शहरों में टेबल पर आराम से बैठकर पढ़ते बच्चे।जब "सर्व धम्म एक" जैसी बात भारत में कही जाती है,तो सिर्फ जाति में ही नहीं बच्चो में भी फर्क क्यों??और ये कैसा फर्क है जो बच्चो में नहीं अपितु शिक्षा पद्दति में दिखता है।
जब एक बच्चा मजदूरी करके भी अपने आप को शिक्षित करना चाहता है तो फिर उसे क्यों उस तरह की शिक्षा हासिल नही हो पाती जैसी एक शहर के बच्चे को होती है।
शिक्षा के मामले में तो भेदभाव और नहीं किया जाना चाहिए,तो फिर हमारे भारत में क्यों इस तरह की शिक्षा बच्चो को मिल रही कि ग्रामीण परिवेश और शहरी परिवेश में फर्क होता है।शिक्षा तो सभी के लिए एक जैसी होनी चाहिए।गरीब का बच्चा हो चाहे अमिर का बच्चा हो।सभी को एक ही तरह की शिक्षा प्रणाली हासिल होनी चाहिए।ये बच्चो का दुर्भाग्य ही है जो उन्हें इस तरह से शिक्षा में भेदभाव सिखने मिल रहा।
यदि यही हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं जब अमीर लोग भारत से पलायन ना करके,गरीब करने लगेंगे और हो भी क्यों ना जब कोई फर्क किसी को पड़ता ही ना हो।
बच्चो का भविष्य एक जैसा होना चाहिए तो फिर प्रशासन कुछ करता क्यों नहीं।जब हर घोटाले के लिए पैसे कम नहीं पड़ते तो फिर भविष्य निर्माण में पैसा क्यों कम पड़ रहा है?
ये प्रश्न नही एक आश्चर्य का विषय है कि हम जिस देश में रह रहे है।वहाँ का प्रशासन,बच्चे और लोग एक ऐसा देश बना रहे है जहाँ निरन्तर भेदभाव को गले लगाया जा रहा है।
मसलन मुद्दा सिर्फ इतना सा नहीं है कि कोई चार दिवारी में कक्षा लेता है या कोई एक बड़े से महल में क्लास चलाता है,बल्कि मुद्दा तो यह है कि यदि चार दीवारी और महल में पढ़ने वाले बच्चो की शिक्षा प्रणाली एक जैसी कर दी जाए।ताकि भविष्य में उन्हें कोई समस्या या असमंजस में ना पड़ना पड़े।