Friday, 21 April 2017

ज़िंदगी मौत ना बन जाए संभालो यारों

गर्मियों की वजह से पहले ही आग के गोले कम नही बरस रहे थे,ऊपर से आए दिन बड़े-बड़े हादसों का सामना करना पड़ रहा है और इन सब पर एक नजर डाले तो इन हादसों में लोगो की मौत ऐसे हो रही है,जैसे सामूहिक विवाह में कई जोड़े ब्याह रचा रहा हो।इन सब बातों को अगर एक अलग नजरिए से देखे तो प्रशासन इन मामलों के लिए कितना सतर्क है,यह सबसे बड़ा प्रश्न है?
अगर कल हुए घटनाक्रम को देखा जाए तो 13 लोगों की मौत की वजह शायद प्रशासन की लापरवाही भी रही।सहकारी समिति केंद्र जहाँ केरोसिन रखा होता ही है वहाँ सीजफायर तक नहीं था और जहाँ दमकल गाड़ियों को जल्द से जल्द पहुँचने की जरूरत होती है।वहाँ अच्छा-ख़ासा समय लग जाता है।जरूरत है ऐसे में कमियों पर ध्यान देने की,लेकिन इन सब बातों पर ध्यान देना लाज़मी नही समझा जाता है।हम और प्रशासन दोनों ही लापरवाही पर ध्यान देते है,ताकि पहले घटना घटित हो जाए फिर हम उस पर विचार करे और सावधानी बरतें।
ये सावधानियां अक्सर किसी को मौत के घाट उतार कर ही हम अपनाते है।ऐसे में जरूरत है हमे कि हम किसी की मौत का तमाशा देखने से पहले उस चीज़ के लिए सतर्कता बरते।हालांकि हर बार यह भी सही नही है कि गलती प्रशासन की ही हो या किसी व्यक्ति विशेष की ही हो।कभी-कभी हालात भी मजबूर हो जाते है और हम तो फिर उसका शिकार हो ही जाते है।
हाल ही में हुए इंदौर की एक फैक्ट्री में धमाके से वहाँ के मालिक की मौत हो गई।अब ऐसा तो हो नही सकता कि फैक्ट्री मालिक ने सुरक्षा के इंतेज़ामात ना किए हो,लेकिन उस समय हालात ना रहे हो कि वे खुद को बचा पाए।ऐसे में जरूरत है हमे अपनी सुरक्षा को लेकर खुद सतर्क रहने की।

Friday, 27 January 2017

तारीखों पर जागती हमारी देशभक्ति!

जिस गति में हमारा देश तरक्की और उन्नति कर रहा है उससे लाज़मी है कि हम आगे बढ़ रहे है।हमारी सोच आगे बढ रही है,लेकिन क्या सिर्फ हमारी सोच पाश्चात्य सभ्यता को अपनाने तक ही आगे ही बढ़ रही है,या उससे आगे भी हम सोच रहे है।
बात यहाँ सिर्फ सोच या समझ की नहीं है अपितु बात है कि क्या उस बढ़ती हुई सोच ने हमारी देशभक्ति और राष्ट्र के प्रति समर्पण को भुला दिया है?आखिर आज के समय में तो जहाँ हम एक ओर बड़ी ही सज्जनता के साथ किसी भी शहीद की शहादत को सलाम करते है,तो वही दूसरी ओर इस सलाम को केवल एक दिन का ड्रामा बना कर छोड़ रहे है।
क्योंकि इसके बाद तो हिमारे दिलो में देशभक्ति का एक अंश भी नजर नही आता।देशभक्ति दिल से की जाती है या फिर 15 अगस्त और 26 जनवरी को अपने गालों पर तिरंगा बना लेने से होती है।आज के समय में तो इस बात का आकलन करना ही मुश्किल है कि कौन देशभक्त है और कौन दिखावे का साथी है!
खैर इन सब बातों पर ध्यान दिया जाए तो यह सब बस लोगो के लिए आज के समय में एक ट्रेंड बन गया है।जिसे चार लोगो के सामने दिखाना के लिए किया जाता है।अगले दिन तो देशभक्त अपने तिरंगे को पहचान भी नही पाते और जो राष्ट्रिय ध्वज को 15 अगस्त,26 जनवरी के दिन हाथों में लिए फिरते है अगले ही दिन उस राष्ट्रिय ध्वज को सड़कों पर या नालो में पड़ा हुआ पाते है।इससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि देशभक्ति का आज के समय में क्या अर्थ और क्या तात्पर्य है।

Tuesday, 24 January 2017

क्या वाकई गणतंत्र दिवस मायने रखता है युवाओं के लिए

वैसे तो गणतंत्र दिवस हम भारतीयों के लिए कॉफी मायने रखता है,लेकिन क्या हमारी युवा पीढ़ी भी वही सोचती है जो हम सोचते है?गणतंत्र दिवस हम इसलिए मनाते है,क्योंकि इस दिन हमारा संविधान लागू हुआ था।
किसी भी देश का लिखित संविधान होना कॉफी गर्व की बात होती है,लेकिन क्या ऐसा हमारे युवा भी सोचते है?आज का युवा जिन मौज और मस्ती में मग्न दिखाई देता है।उसे देखकर यह बिलकुल नहीं लगता है कि उन्हें गणतंत्र दिवस या स्वतंत्रता दिवस के होने से कुछ फर्क भी पड़ता है।वह लोग तो बस अपने मजे करने और कानून को तोड़ने में ज्यादा ध्यान देते है।
आज की युवा पीढ़ी अगर गणतंत्र दिवस या स्वतंत्रता दिवस को उत्सव के तौर पर मनाती भी है तो सिर्फ इस वजह से क्योंकि उनके स्कूल या कॉलेज में उस दिन जरूर कोई अटेंडेंस की निश्चितता रहती होगी।अन्यथा आप यही पाएंगे कि उन विद्यार्थियों की संख्या अक्सर गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर कम हो जाती है,जबकि वही विद्यालय या विश्व-विद्यालय में गेदरिंग के समय पूरा मैदान भरा हुआ सा दिखाई देता है।
यह हमारा युवा भारत है जो देशभक्ति गीतों को सुनना पसंद नही करते और वही डीजे वाले बाबु जैसे गानों पर धूम मचाते है।और मचाए भी क्यों ना युवा है गरम खून है।जिनमे हुड़दंग मचाने का साहस है पर संविधान से उन्हें क्या लेना देना।संविधान से उन्हें कहाँ मौज करने मिलती है।
और रही बात युवाओं को उनके अधिकार जानने की तो जिस दिन जरुरत होगी उस दिन खुद ही गूगल करके देख लेंगे,पर अभी तो उनके मौज करने का समय है।ऐसा आज का लगभग 90%युवा सोचता है।

Wednesday, 14 December 2016

एक नई शुरुवात के साथ एवेंजर्स के प्रेजिडेंट ने दी सुरक्षा भी

एवेंजर्स के राइडर्स के लिए इस बार कॉफी रोचक ही माहौल नजर आ रहा है।इसकी एक वजह जहाँ भोपाल का भी क्लब में शामिल होना है तो दूसरी वजह राइडर्स के लिए बढ़ाई गई सुरक्षा का होना है।
ख़ास बात देखी जाए तो एवेंजर के प्रसिडेंट की सोच है।जिन्होंने राइडर्स की सुरक्षा और उनके आनंद को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा के पुख़्ते इंतज़ामात किए है।जहाँ एक और राइडर्स के लिए मनोरंजन को प्रेजिडेंट बढ़ावा दे रहे है वही दूसरी ओर उन्होंने पूरी तरह से एवेंजर्स के राइडर्स को लेकर सावधानी बरती है।
इस बार भोपाल का क्लब में जुड़ना एवेंजर राइडर्स के लिए बड़ी ही ख़ुशी की बात हो गई है,क्योंकि अब भोपाल के राइडर्स को दूसरे क्लब में जाने की जरुरत नहीं पड़ेगी।
18 दिसम्बर को होने वाली यह मीटिंग बहुत ही रोचक साबित होगी,क्योंकि इस बार इंदौर और भोपाल के लगभग 55 राइडर्स इस मीटिंग में सम्मिलित होंगे।साथ ही ये लोग एक नई राइड लेंगे।अक्सर परिवार के सभी सभी लोग साथ होते है तो बड़ा मजा आता है और एवेंजर के राइडर्स भी एक परिवार की तरह बन चुके है।यही वजह है कि जब ये सभी लोग साथ में राइड पर जाएंगे तो आनंद दुगना हो जाएगा।एक तो एवेंजर परिवार का साथ और दूसरा प्रेजिडेंट की ओर से सुरक्षा के पुख़्ते इंतेज़ाम।साथ ही भोपाल क्लब का भी जुड़ना।इतनी सारी चीज़ो को देखते हुए यह राइड काफी सुरक्षित और आनंदमय होगी।
किसी भी दृष्टि से देखा जाए तो यह परिवार खुशहाल और सुरक्षित दिखाई दे रहा है।भोपाल क्लब में होने वाली मीटिंग में जब 55 लोग होंगे तो जाहिर से बात है प्रेजिडेंट के लिए ख़ुशी की बात तो होगी ही और जहाँ एक तरफ ख़ुशी उन्हें होगी तो उन्हें सभी की सुरक्षा का भी ध्यान रखना ही होगा।इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने क्लब के मेंबर्स के लिए कुछ नए-नए तरीके और सामना उपलब्ध कराए है।

Thursday, 8 December 2016

शिक्षा में भी ऊँच-नीच का दिखता फर्क..!!

भारत में शिक्षा पद्धति शुरू से ही जिस क्रम में रही है उसका कोई मोल-भाव ही नहीं है।गाँधी जी के ज़माने से लेकर अब तक शिक्षा पद्धति में आए फ़र्क को हम क्या महसूस करे?ये तो साफ़ देखने से ही पता चलता है कि हमारी शिक्षा पद्धति कितनी उच्च है,तभी तो गांधी जी को भी भारत छोड़ विदेश में पढाई करनी पड़ी थी।
यदि बात करे आज के ग्रामीण और शहरी शिक्षा पद्धति की,तो दोनों ही एक दूसरे के विपरीत सी दिखाई पड़ती है।कहाँ गाँव में टाटपट्टी पर बैठकर पढ़ते बच्चे तो कहाँ शहरों में टेबल पर आराम से बैठकर पढ़ते बच्चे।जब "सर्व धम्म एक" जैसी बात भारत में कही जाती है,तो सिर्फ जाति में ही नहीं बच्चो में भी फर्क क्यों??और ये कैसा फर्क है जो बच्चो में नहीं अपितु शिक्षा पद्दति में दिखता है।
जब एक बच्चा मजदूरी करके भी अपने आप को शिक्षित करना चाहता है तो फिर उसे क्यों उस तरह की शिक्षा हासिल नही हो पाती जैसी एक शहर के बच्चे को होती है।
शिक्षा के मामले में तो भेदभाव और नहीं किया जाना चाहिए,तो फिर हमारे भारत में क्यों इस तरह की शिक्षा बच्चो को मिल रही कि ग्रामीण परिवेश और शहरी परिवेश में फर्क होता है।शिक्षा तो सभी के लिए एक जैसी होनी चाहिए।गरीब का बच्चा हो चाहे अमिर का बच्चा हो।सभी को एक ही तरह की शिक्षा प्रणाली हासिल होनी चाहिए।ये बच्चो का दुर्भाग्य ही है जो उन्हें इस तरह से शिक्षा में भेदभाव सिखने मिल रहा।
यदि यही हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं जब अमीर लोग भारत से पलायन ना करके,गरीब करने लगेंगे और हो भी क्यों ना जब कोई फर्क किसी को पड़ता ही ना हो।
बच्चो का भविष्य एक जैसा होना चाहिए तो फिर प्रशासन कुछ करता क्यों नहीं।जब हर घोटाले के लिए पैसे कम नहीं पड़ते तो फिर भविष्य निर्माण में पैसा क्यों कम पड़ रहा है?
ये प्रश्न नही एक आश्चर्य का विषय है कि हम जिस देश में रह रहे है।वहाँ का प्रशासन,बच्चे और लोग एक ऐसा देश बना रहे है जहाँ निरन्तर भेदभाव को गले लगाया जा रहा है।
मसलन मुद्दा सिर्फ इतना सा नहीं है कि कोई चार दिवारी में कक्षा लेता है या कोई एक बड़े से महल में क्लास चलाता है,बल्कि मुद्दा तो यह है कि यदि चार दीवारी और महल में पढ़ने वाले बच्चो की शिक्षा प्रणाली एक जैसी कर दी जाए।ताकि भविष्य में उन्हें कोई समस्या या असमंजस में ना पड़ना पड़े।

Tuesday, 15 November 2016

कालाधन लाना है या भारत को सताना है

मोदी जी ने अचानक कालाधन लाने के लिए 500 और 1000 के नोट तो बंद करा दिए है,लेकिन इसका असर सबसे ज्यादा आम नागरिक पर देखने को मिल रहा है।मोदी जी चाहते तो थे कि सब बराबरी से लाइन में लगे,लेकिन अफ़सोस ऐसा हो नहीं पाया।
जिस उम्र में उनकी माँ को सहारे की जरुरत है उस समय वो बैंक में लाइन में लगकर नोट बदलवा रही है और जिन्हें बदलवाने चाहिए वे तो हाथ बांधकर बढ़िया से आराम फरमा रहे है।खैर ये बात तो सिर्फ मोदी जी प्रधानमंत्री है इस लिहाज से हम देख रहे है,लेकिन उन बुजुर्गों का क्या जिनके पास आसरे के लिए कोई भी नही है और जो कतार में लग कर पैसा पा रहे है??उनकी फ़िक्र कौन करेगा?मोदी जी आपका फैसला कालाधन लाने का था या देश की जनता को सताने का था।
जो भी हो पर आपने जिस भी नजरिए से यह फैसला लिया था वो अब दरअसल उल्टा ही नजर आ रहा है,क्योंकि आपकी सोच थी कि कालाधन उजागर हो।लेकिन देश के भ्रष्ट लोगो ने तो पहले ही उसका उपाय किया हुआ है।मतलब बात ये है कि कालाधन रखे हुए व्यक्ति अपना सारा पैसा विदेशो में रखे हुए है,जिसे आप नहीं देख सकते और आज तक ऐसा कोई मापने का पैमाना नही बना है जो कालाधन माप सके।
तो जिनके लिए ये नोट बदलने का हथकंडा आपने अपनाया था,वो तो चले गए सुरक्षित क्षेत्र में और आम जनता तो गई कतार में।
खैर देखते है कितना और समय अब लगता है कालाधन वापस लाने में,क्योंकि हर सरकार का एक मुद्दा ये जरूर है कि वो कालाधन लाएगी वापस,पर अफ़सोस वो बस एक मुद्दा ही रह जाता।कही इस बार भी कालाधन वापस लाना एक मुद्दा बनकर ना रह जाएं।
राजनैतिक हथकंडे ही लगते है अब ये कुछ मुद्दे तो।जिनमे से एक कालाधन वापस लाने वाला है।बाकी गरीबी मिटाना,भ्रष्टाचार मिटाना, भूखमरी, महँगाई जैसे मुद्दे तो रहते ही है,पर कालाधन अब तक रामदेव बाबा ला रहे थे और अब सरकार जुट गई है तो लगता है इस बार तो आ ही जाएगा।खैर सब लुभावना लगता है पर कभी होते हुए दिखा नही तो एक सपना सा भी लगता है।

Saturday, 5 November 2016

मोदी जी की बहार,किया पत्रकारों को बाहर।

वाह रे मोदी सरकार आप हो खुशियो की बहार,लेकिन किन लोगो के लिए।बड़ा सवाल तो ये है कि आखिर आप किन लोगो के लिए बहार लाने का काम कर रहे??इस सवाल का यदि जवाब दिया जाए तो चाटुकारों का।हँसी आती है इस बात पर की पत्रकारिता यदि चाटुकारिता के भरोसे चलने लगी तो लगता है कि शीघ्र ही पत्रकारों को सन्यास ले लेना चाहिए।क्योंकि यदि पत्रकारिता चाटुकारिता पर निर्भर करती है तो पत्रकार का अस्तित्व ही खत्म हो जाता है।

युवा पत्रकारों को आपके NDTV को बैन करने से एक नई मोदी सोच का पता तो चला कि आप ये नई पीढ़ी को अंतर्मन से कह रहे होंगे कि अरे मूर्खो तुम भी रविश कुमार की भाँति सच और अच्छी फुटेज ना दिखाना वरना तुम युवा पत्रकारों पर ही बैन लगा दूँगा।

सांप भी मर जाएं, लाठी भी ना टूटे।
क्या करना है पत्रकारों का वैसे भी किसी भी घोटालों को सामने लाकर रख देते है।भई आखिर हम मंत्री है हमारा भी कोई अधिकार है।अधिकार यह है कि हम बड़े-बड़े घोटाले कर सके,लेकिन यदि घोटाले करते है तो ये पत्रकार और मीडिया चैन से रहने कहा देता है।बेहतर यही होगा कि सच को जो सामने लाने की कोशिश करे उसे ही खत्म कर दे,ताकि साँप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे।

यदि ये हतियार सही है तो देश में पत्रकारों और मीडिया का रोल ही खत्म हो जाता है।इस हिसाब से देखे तो पत्रकारिता ही ख़त्म हो जाएंगी।लेकिन ऐसा होगा भी तो नहीं ना,क्योंकि देश का भविष्य तो चाटुकारिता और चाटुकार है।तब तो साधारण सी बात है कि पत्रकारिता को चाटुकार ही जिन्दा रखेंगे।

हाँ खैर सही भी है पत्रकार यदि चाटुकार  रहे तो नेताओं के वाह रे न्यारे और जनता सारी लगाओ रे नारे।मापदंड का पैमाना काफी सटीकता से प्रयुक्त किया है सरकार ने।विपक्ष को बदनाम करना हर राजनैतिक दल का अधिकार है मानो,पर पत्रकारों या मीडिया को बदनाम करना ये कौन सा नया अधिकार कानून में शामिल हो गया।

बात तो ये है कि आप बहुत सहजता से ये काम कर सकते है,लेकिन आपके तराजू में पत्रकारों को तौलना का मापदंड समझ से बाहर है।ऐसे तो लगभग हर चैनल पर आपने बैन करना चाहिए था पर किया नहीं।हाँ शायद उन चैनलों की सीमा NDTV की सीमा से ज्यादा रही होगी या फिर वे चैनल्स आपके पसंदीदा रहे होंगे।खैर पसंद नापसंद तो क्या ही कहे मुश्किल है,पर लगता है यहाँ भी वही चाटुकारिता का जलजला है जो शायद NDTV कर नहीं पाया।उसका ही खामियाजा भुगत रहा है।