एक दिन था जब वो अपने घर के अंधेरे में बैठ कर सुबह के उजाले का इंतज़ार कर रहा था,लग रहा था मानो किसी उलझन में हो।जब माँ ने उससे पूछा इस तरह यहाँ रात के अँधेरे में क्यों बैठे हो?उसने दर्द भरी आवाज़ में कहा माँ हमारे जीवन में उजाला कब आएगा?सुबह की पहली किरण हमारे घर में तो रौशनी की किरण लाएगी,लेकिन हमारे जीवन का उजाला कब होगा।माँ ने बड़ी विनम्रता से कहा ऐसा क्यों सोचते हो बेटा हर दिन अपना एक उजाला लिए हुए है,हर दिन रौशनी की एक किरण हमारे पास होती है,बस जरुरत है तो उतनी की उसे महसूस कर उसे जीवन में लाने की।हम हर दिन कुछ नया सोचते है,नया करना चाहते है,पर ये जरुरी तो नहीं की हर वक़्त हर चीज़ मिल ही जाये।माँ की उस बात ने उसके मन में एक नयी ऊर्जा का मानो संचार कर दिया हो,वह उस सुबह के इंतज़ार में नहीं था,उसने उसी वक़्त से माँ की बात पर अम्ल किया,मोमबत्ती जलाकर उसने पढाई शुरू की।उसकी मेहनत और लगन इतनी थी की कुछ महीनो बाद माँ को एक पत्र से पता लगा की वो लड़का आज कलेक्टर बनने की आधी प्रक्रिया को पूरा कर चूका है।माँ की आँखों में ख़ुशी के आँसू थे।माँ ने जब उससे पूछा इतने बड़े कैसे हो गए इतनी जिम्मेदारिया कैसे आ गई??वह मुस्कुराया और बोला माँ ये तेरा आशीर्वाद और दुआ है और तेरी सिख है जो आज मै उस मुकाम पर हूँ जहा देखकर हर माँ को अपने बेटे पर गर्व होगा।तेरी उस सिख और अंधेरे की उस रौशनी ने मेरे जीवन में लक्ष्य भरी रौशनी को लाया और आज मुझे इस मुकाम पर ला खड़ा किया है जहा से मै अपने और तेरे जीवन को नयी रौशनी दूंगा।
No comments:
Post a Comment