ज़िन्दगी की राहे भी बड़ी अजीब सी लगती है।जब तक आप इसके है ये आपकी है और जब आप इससे दूर हो गए ये आपको गुमनाम सा कर देती है।समय की मार थी या वक़्त की पाबन्दी जब मुझे इस दुनिया को छोड़ दूसरी दुनिया में ना चाहते हुए भी प्रवेश करना पड़ा
बड़ी दुविधा है मन में जब तक इस संसार में था इसको काबू में ना कर पाया और अब जबकि करना चाहता हूँ तो इस संसार से दूर हूँ।अजीब कशमकश का शिकार है ये मानव शरीर।जब तक मायारूपी संसार में होता है इसे सब कुछ चाहिए होता है और जब देह का त्याग कर दे तब सोचता है की काश सब हासिल हो जाता।
दुर्घटना में हुई मौत से मेरा मन काप उठा ऐसी म्रत्यु चाहता तो ना था पर हो गई और जब हुई तो लगा कि इतने जल्दी कैसे हो गई।अभी तो मेरी उम्र खेलने कूदने की थी और बड़ा भी कहा हुआ था।अब दूसरे संसार में आकर लगता है कि काश कुछ समय और मिला होता तो अपने सारे सपनो को कम से कम पूरा तो करता।लेकिन अब ये मेरे बस में नहीं।आखिर मैंने ऐसा क्या गुनाह किया था जो मुझे इतने जल्दी मौत मिली।कम से कम भगवान इतना समय तो और देते कि अपनी माता-पिता के ही सपने सच कर पाता।लेकिन आपसे ये देखा नही जा रहा था।।लेकिन गलती आपकी भी तो नहीं थी ना काश उस वक़्त मै ही गाड़ी इतनी रफ़्तार से ना चला रहा होता तो इतना बड़ा हादसा ना होता और ना ही उस दुर्घटना में मेरी मौत हुई होती।जैसे आज मै पश्चाताप कर रहा हूँ वैसे कोई और ना करे।रफ़्तार धीमे करे तो केवल मौत से नहीं बचोगे बल्कि वो सपने भी बचेंगे जिनको पूरा करने की आशा है।कुछ लोग होते है जिन्हें सिर्फ मस्ती से मतलब होता है उनमे से एक मै भी था लेकिन अब दुःख होता है काश संभल गया होता तो कम से कम आज उन सपनो को पूरा करता जिनके लिए सोचा था।पर मेरी मस्ती ऐसी भारी पड़ी की ऐसी प्रतियोगिता पुनर्जन्म मिलने पर दोबारा ना करूँगा।रफ़्तार की ये प्रतियोगिता मेरी ज़िन्दगी के साथ मेरे सपनो को भी छीन ले गई।
Monday, 28 September 2015
रफ़्तार की मौत
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