Wednesday, 16 December 2015

बदलते रास्ते

रास्ते बड़े अनजान थे,
हर सड़क सुनसान थे,
फिर भी चल रहा था राहगीर,
क्योंकि मंज़िल पे सवार था।
गुम हुआ कुछ रास्तो पर,
लेकिन हर पल बरकरार था।
तत्परता का मार्ग जो था,
आँखों में वही उजाला था।
पैरो में चुभन थी,
फिर भी एक लगन थी।
मार्ग पे चलता रहा और
जा पंहुचा उस शिखर पे,
जहाँ उसका उजेला था।
रास्ते में काटे तो बहुत थे,
मगर उन काटो में गुलाब की महक थी।
इस महक ने याद दिलाई वो मंज़िल,
जहाँ एक नया सवेरा था।
कुछ शिशो की चुभन भी हुई थी,
लेकिन इस चुभन में भी पारदर्शिता थी,
जो उस मकसद को स्पष्ट करती थी।
हर नकारत्मक्ता को अनदेखा किया,
इसलिए हर दर्द में ख़ुशी का इशारा मिला।
#aim#positivity.

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