ना जाने ऐसा क्या गुनाह किया था मैंने पिछले जनम में कि इस जनम में भगवान आपने मुझे बेटी बनाया।क्या बेटी होने का मतलब हर दफे सबकी सुनना,सबका ध्यान रखना और सबकी मर्जी के अनुसार चलना ही होता है???अगर ऐसा है तो मेरे जीवन का अस्तित्व ही क्या है??क्यों है??क्या मेरी अपनी कोई सोच नहीं,कोई आजादी नहीं।ये तो तब तक की बात है जब तक मेरा नया जीवन शुरू नहीं हुआ है।जिस दिन मेरे नए जीवन की शुरुआत हो गई,मै अपने ससुराल चली गई उस दिन से क्या मेरा जीवन परिवर्तित होगा या मुझे ही परिवर्तित होना पड़ेगा।
क्या हर दफे सबकी इच्छाओ के अनुरूप मुझे ही बदलना पड़ेगा??क्या कभी मेरे लिए कोई अपनी सोच,अपनी इच्छा को नहीं बदल सकता।यदि ससुराल अच्छा मिला तब तो ठीक है और अगर कोई लड़ाकू,लालची परिवार से पाला पड़ा तब तो मेरा जीवन ही बेकार है।पहले तो दहेज़ के लोभी हर दफे मुझे परेशान करेंगे और मेरे घर वालो को भी परेशान करेंगे।यहाँ तक तो शायद बात अलग ही थी लेकिन फिर हर बात में मुझे परेशान करना मारना पीटना ये कैसा दहेज़ का लालच है।कभी मेरी कोई बात ना मानकर,हर बात के लिए मुझे जाहिलो की तरह मारना ही मकसद है।क्या मेरा जनम सिर्फ घरेलु हिंसा सहने के लिए ही हुआ है।हर वक़्त घर के कामो में उलझे रहने के बाद क्या कभी मेरा मन नहीं होता होगा कि कही घुमु कुछ पल हँस लू मै भी।लेकिन जब भी ऐसा करने की कोशिश करती हूँ उससे पहले वो मार का दर्द मुझे पिछले दिन की याद दिला देता है।जैसे मै कोई खिलौना हूँ जिसे जब चाहा खेल लिया और जब चाहा उठा के फेक दिया।क्या मेरा लड़की होना गुनाह है,यदि ऐसा है तो हे!भगवान अगले जनम मुझे बेटी ना बनाना।लेकिन ये दर्द कब तक मुझे सेहते ही रहना है,क्या हर जनम में ये दर्द मुझे ही मिलेगा,क्योंकि मै एक लड़की हूँ इसकी सजा मुझे कब तक भुगतनी होगी।क्या मै एक इंसान नहीं???लेकिन अब तक जो हुआ सो हुआ,किन्तु अबसे मै ना तो अपने साथ बुरा होने दूंगी ना ही दुसरो के साथ।भगवान ने यदि मुझे बेटी बनाया है तो कुछ तो मुझमे भी बेटो से जादा समझदारी दी ही होगी।शुक्रगुजार हूँ मै आपकी प्रभु की आपने इस जनम में मुझे बेटी बनाया ताकि मै सारे जुर्म ना सेहते हुए उस जुर्म के विर्रुद्ध संघर्ष करू और मै यही चाहती हूँ कि अब मुझे अगले जनम और हर जनम मे सिर्फ बेटी ही करना,ताकि मै सारे अत्याचारो के खिलाफ आवाज़ उठा सकूँ,लड़ सकूँ।
Sunday, 25 October 2015
अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो।
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