शहरीकरण,औद्योगिकीकरण दो ऐसे शब्द है जिसने लोगो का शहरो की ओर रुझान बढ़ाया।बढ़ने के कारण लोग आज कल गाँवो को छोड़ कर शहरो की ओर जा रहे।गाँव लोग और आज की पीढ़ी तो जैसे इसे जानते ही ना हो,लोग दूर भागते है।गाँव में भी अब शायद ही किसी पेड़ की नीचे पंचायत वाला माहौल ही बचा हो।क्या नज़ारे थे जब लोग पेड़ के नीचे बैठ कर कोई समस्या का निदान किया करते थे।आस-पास कुछ जानवर भी हुआ करते है।
मगर आज के दिन कुछ ऐसे है कि लोग अदालतों में मुकदमा चलाते है।अपने पराये होते जा रहे है और पराये अपने।दिखावट की इस कशमकश में लोग अपने पराये में अंतर भूल रहे है।खैर परयो को अपना बनाना कोई गलत बात तो नहीं किन्तु अपनों को पराया करना बहुत मुश्किल सा लगता है।धूमिल सभा ही बड़ी याद आती है।बच्चा जब खाकी रंग के वस्त्रो में विद्यालय जाया करते थे,अब वो नज़ारे कही गुल से लगते है।आजकल तो बच्चे भी बड़े अफसरों जैसे वस्त्रो में दीखते है जो की विद्यालयीन छात्र है।
शहरीकरण का खुमार ऐसा छा गया है कि लोग 1 दिन अपने घर में अतिथि भी स्वीकार नहीं कर पाते।
अतिथि देवो भवः तो केवल अब किताबी पन्नों में नज़र आता है,जो कि कुछ शब्द ही रह गए है।लोगो का विश्वास यह रह गया है कि जो बलवान है या पैसो से भरा हुआ है वही रिश्तेदार है,उसके तलवे धोकर पानी पीना ही सार है और जो गरीब है या जिसके पास बाहुबल नहीं उससे कोई रिश्ता नहीं,वे हमारे तलवे धोकर पानी पिए।ये कैसा अजीब सा नवीनीकरण हुआ है इस संसार का की अपने अपनों को भूल रहे और पराये अपने होते जा रहे।
बिल्डिंगो में रहना लोग शान मानते है और झोपड़ों में रहने वालो को आम मानते है।लेकिन कई दफे बिल्डिंगो की शान कुछ नहीं कर पाती और झोपडो के आम कुछ कर दिखा देते है।और ऐसा कई दफे नहीं अक्सर देखा जाता है।शान हो या अपमान दोनों का अपना महत्त्व है,कुछ लोग शान रहने के बाद अपमानित होते है तो कुछ अपमानित होकर,शान को प्राप्त करते है अर्थात जो अपमान झेलता है उसे चीड़ होती है एक बदले की जो वो कुछ हासिल कर शान प्राप्त करता है।बड़ा अजीब सिलसिला है जो थमने का नाम ही नहीं लेता,पलायन होता जा रहा और लोग खुद को मजबूर करते जा रहे।लेकिन उन किसानो का जिनके दम पर लोग जी रहे है,कभी यदि उन्होंने भी शहरों की ओर पलायन किया तो बाकि लोगो का क्या होगा क्या फिर लोग अपने घरो में छोटी-छोटी क्यारियों में सब्जी-भाजी लगाकर खुद ही किसान बन जायेंगे।
Sunday, 11 October 2015
पलायन
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment